أدِرْ علينا الكؤوسا
| وعبّها بالهواء
| فقد نطيلُ الجلوسا
| عيونُنا في السّماء
| تصطاد غيما عبوسا
| حتّى يجود بماء
| فنملأنّ الرؤوسا
| بخمرِ هذا الفضاء
| ونخلعنّ النّفوسا
| من بعد خلع الحذاء!
| ولا تُظلْ ... وأدرها
| وقلْ: سلاماً.. وضعْها
| واذهبْ
| وعُد.. ثمّ خذها
| واضحك الى من ينادي
| حتّى يقال:
| تدور
| أمورُ
| هذي البلاد!
| وكن عطوفاً علينا
| ولا تقطّب جبينا
| محمحمتين أتينا
| لحانكم.. كالجياد
| بل فاسقنا يا حبيبي
| ما تشتهي من حليبِ
| من عهد نوحٍ وعاد
| الطّبُ ضدّ الزبيب
| لذاك قيل:
| تدورُ
| أمورُ
| هذي البلاد!
| واسردْ علينا حكايا
| عن مشمشات الصّبايا
| وكيف قدحُ الزّناد
| فإنّ حلو الكلام
| لمسكرُ كالمدام
| ونافعٌ للعباد
| لذاك قيل:
| تدور
| أمور
| هذي البلاد!
| اليومَ أمرٌ
| - وأمسِ؟
| أفقت من خمرِ حبسي
| ولي رضوضٌ بنفسي
| كأنّني من جماد
| ولو بقيت طليقاً
| مبلّلاً أو غريقاً
| أشدو مع كلّ شاد
| لقرّرت لا تدور
| أمورُ
| هذي البلاد!
| وأنت: ماذا دهاك؟
| لم يبقى نجمٌ سواك
| أدعوهُ دوماً ملاكي
| فيختفي في البعاد
| حتّى النجوم تغور
| لكي يقال: تدور
| أمورُ
| هذي البلاد!
| نهيمُ في كلّ وادِ
| وكلّ ما نبتغيه:
| وسادةٌ للرّقاد
| وطيفُ من نشتهيه
| وكسوةٌ للحداد
| حتّى يقال: تدور
| أمورُ
| هذي البلاد!
| أقداحنا: يا نظافُ
| من كلّ خافٍ وباد
| لسنا الذين نخافُ
| من حبّ هذي البلاد
| لكنها لا تدور
| بل قام فيها المنادي
| ومن رآها تدور
| فالوهم ...
| سوّى لديه:
| خُذروفهُ
| بالبلاد. |
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